गुरुवार, 10 अगस्त 2023

क्या करें...

आती नहीं है नींद अब रातों में क्या करें,

उलझे हैं जिंदगी तिरी बातों में क्या करें,


हाथ से मुंह तक की दूरी बढ़ती ही गयी,

घटती गयी जो थी रक़म खातों में क्या करें,


मेहनत की उँगलियों में बनीं ठेंठ तो मगर,

क़िस्मत की ही रेखा नहीं हाथों में क्या करें,


नाक़ामयाबीयों की नज़र कोशिशों पे थी,

सिमटी उमर दो लफ्ज़ शह-मातों में क्या करें,


हसरत तो थी "संजीव" को, कुछ कर दिखायेंगे,

दिखते हैं वो भी हारकर जातों में क्या करें .


संजीव मिश्रा 



गुरुवार, 11 मार्च 2021

मुबारकबाद इस दिन की.....

तुम्हें सौ साल तक बोलूं मुबारकबाद इस दिन की,
न ऐसा दिन कभी आये के ना हो याद इस दिन की।

रहे सौ साल तक रौशन तुम्हीं से घर हमारा ये,
यूं ही खिलता-दमकता सा रहे मुखड़ा तुम्हारा ये,
तुम्हारे साथ हों सुबहें, तुम्हारे साथ हों शामें,
तुम्हारे साथ में बीते हरेक दिन-रात जीवन की।


न ऐसा दिन कभी आये के ना हो याद इस दिन की।

कमी कुछ न कहीं भी हो, मिटे खुशियों से हर दूरी,
न हसरत कुछ रहे, हों सब तुम्हारी ख्वाहिशें पूरी,
छलकता हो हृदय सुख से, मिले समृद्धि हर तुमको,
हों पूरे सब तुम्हारे स्वप्न, और  हर कामना मन की।


न ऐसा दिन कभी आये के ना हो याद इस दिन की।

तुम्हें सौ साल तक बोलूं मुबारकबाद इस दिन की,
न ऐसा दिन कभी आये के ना हो याद इस दिन की।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

कोई मेरे दिल से पूछे , तेरे तीरे-नीमक़श को, 

ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता.    - ग़ालिब

शनिवार, 13 जून 2020

रब दिख गया है........

रब दिख गया है........

ये तिरछी निगाहें, ये भौंहें कटीली,
अधर ये रसीले, नसीका नुकीली ,

ये गहरा सा काजल, ये गेसू के बादल,
ये तीखे से तेवर, जवानी के जेवर,
तुम्हें देखकर कोई, क्या बोल पाये,
जुबां हुस्न पर तेरे, क्या खोल पाये,

बस इतना कहेंगे, के कुछ न कहेंगे,
तुम्हें देखकर सिर्फ, चुप ही रहेंगे,

ये काला सा तिल इक, ग़ज़ब ढा रहा है,
तुम्हें देख कर दिल सुकूं पा रहा है,

ये इक बाद मुद्दत, के कुछ, कह है पाई,
ये तस्वीर तेरी, क़लम को है भायी,

तेरे क़दमों में  आज सर झुक गया है,
के “संजीव “ को आज रब दिख गया है ............संजीव मिश्रा

बार-बार क्यूँ............

बार-बार क्यूँ............

है किसका इंतज़ार जाने, किसकी जुस्तजू,
दरवाज़े पे उठती नज़र, है बार-बार क्यूँ,

हर बार हर महफ़िल से हम ही बेदख़ल हुए,
तनहाई का ये बोझ सर पे, बार-बार क्यूँ,

लगती अधूरी सी है क्यूँ, अपनी ही शख़्सियत,
मैं क्यूँ उसी पर जाऊं हूँ, यूं बार-बार क्यूँ,

कुछ बात है दिल में, कोई जो कह न मैं सका,
लिखता हूँ और फ़िर फाड़ता, ख़त बार-बार क्यूँ,

अपनी तरफ़ से बोलता, जब है नहीं कभी,
देता जवाब फ़िर मुझे, वो बार-बार क्यूँ,

वो हुस्न है, मग़रूर है, खुद्दार मैं भी हूँ,
फ़िर भी वही दरख़्वास्त इक, है बार-बार क्यूँ,

उस पर कोई ग़ज़ल - नज़म, सब बेअसर रहे,
"संजीव"तुक मिलाये फ़िर भी, बार-बार क्यूँ........संजीव मिश्रा

ख़्वाब.......

ख़्वाब.........

नाशाद ज़िन्दग़ी के बस्ते में,

मायूसियों का

एक सूखा ब्रश पड़ा था,

आँखों की नम कोरों से

लगाया,  गीला किया,

उदासियों की शीशी से,

यादों के कुछ रंग निकाले,

कोशिशों की

कुछ आड़ी-तिरछी

लकीरें बनायीं,

नाकामयाबियों का शेड दिया,

तोहमतों के बक्से से,

बदनामी का डब्बा उठाया,

रुसवाईयों के कुछ और रंग निकाले,

स्प्रे किया, बॉर्डर बनाया,

फ़िर दूर खड़े होकर देखा,

तो अहसास हुआ,

मैं आईने के सामने खड़ा हूँ,

झुंझलाहट का एक पत्थर

उठाकर दे मारा,

एक बेक़ुसूर आईना बिखर गया,

ख़्वाब भी टूट गया।


आज शायद जल्दी सो गया था,


अब तो शायद नींद भी न आये,

डरता हूँ, कहीं वैसा ही ख्वाब,

दोबारा ना आये.........


संजीव मिश्रा

कभी ऐसी दीवाली आये......

कभी ऐसी दीवाली आये...

कभी ऐसी दीवाली आये...
बाहर मिटें अँधेरे,भीतर भी उजियारा छाये,
कभी ऐसी दीवाली आये........

कहीं अभाव या निर्धनता का लेश रहे ना बाक़ी,
सबकी प्यासी कामनाओं को, हाज़िर हो इक साक़ी,
न कहीं किसी मुफ़लिस की बेटी, बिन ब्याही रह जाये ,
कभी ऐसी दीवाली आये......

मेरे देश से  दुर्योधन और दु:शासन मिट जायें,
कभी-कहीं-कोई बालाएं न जबरन नोची जायें,
बेटी हो पैदा तो न फ़िर बाप का दिल घबराये,
कभी ऎसी दीवाली आये....

मैं भी रहूँ प्रसन्न , पड़ोसी भी आनन्द मनाये,
हर कोई अपनी मेहनत का समुचित प्रतिफल पाये,
घर तेरे होकर माँ लक्ष्मी, “संजीव” के घर भी आये,
कभी ऎसी दीवाली आये........................संजीव मिश्रा

अखरते रहे.......

style="text-align: left;"> अखरते रहे.......
 
साल-दर-साल यूं ही गुज़रते रहे,
ज़िन्दा रहने का हम सोग करते रहे,

कैसा ना जाने कर्मों का इक क़र्ज़ था,
सूद नाकामियों का ही भरते रहे ,

अरमां हरजाई थे, ख़्वाब थे बेवफा,
दोसतों की तरह से मुकरते रहे ,

जिंदगी ना संवर पाई अपनी कभी,
हसरतों की तरह ख़ुद बिखरते रहे,

ऐब था माथे की कुछ लकीरों में ही,
कामयाबी को हम ही अखरते रहे,

जी गये वो जिन्होंने न परवाह की,
हम ग़लत और सही बीच मरते रहे,

रास आया न जीवन ये "संजीव" को,
हादसे हर क़दम पर उभरते रहे। ..........संजीव मिश्रा

शनिवार, 16 नवंबर 2019

...........मेरी बाँहों की माला

मेरी बाँहों की माला


तुम सुन्दर उर्वशी भांति मैं इंद्र देव सा मतवाला,
प्रणय भाव  में नर्तन होता मद मोहित करनेवाला,
तुम बिन मैं और मुझ बिन तुम हैं आधे और अधूरे से,
तुम सुन्दरता की अग्नि मैं प्रेम-प्यार की हूँ ज्वाला,

तुम यदि मादकता हाला की, मैं सोने का हूँ प्याला,
पड़ा नहीं अब तक शायद तुम-हारा हम जैसों से पाला,
तुम क्या हो हम जिसको चाहें उसकी क़ीमत बढ़ जाए,
इक काली सी लड़की को मजनूं ने लैला कर डाला,

हमको भी तुम यूं ही कोई ऐसा वैसा न समझो,
जिसको हमने चुना  कभी उसको अपना ही कर डाला,
मेरे आलिंगन में है कुछ ऐसा अदभुत अमरत्व छिपा,
लालायित कितनीं  पाने को मेरी बांहों की माला,

हूँ, ऊपर से फ़रहाद-ओ-राँझा, मन भीतर बैरागी वाला,
अब  रंग सभी  स्वीकृत जीवन के, सुनहैरा या हो काला,
तुम चाहे कुछ भी समझो पर, ये “संजीव” समझता है,
जीवन दुःख था, जीवन दुःख है, जीवन दुःख देने वाला.......  संजीव मिश्रा

गुरुवार, 30 मई 2019

सोचना पड़ा......

सोचना पड़ा......

देखा जो आज आइना, तो सोचना पड़ा,
जो दिख रहा है सामने, वो क्यूँ उदास है,

नाक़ामियाँ-ज़िल्लत-ओ-ग़ुरबत, बिगड़ा मुक़द्दर,
क्या चीज़ है जो आज नहीं इसके पास है,

आंख इक अश्क़ों भरी है चीज़ मामूली,
मेरी हँसीं में है छिपा जो दर्द, ख़ास है,

प्यास-भूख और नींद तो हैं साथ हमेशा,
जो खो गयी कमबख्त वो इक चीज़, आस है,

संजीव को कुछ था भरोसा अपने आप पर,
अब घूमता खोये हुए होशो-हवास है।

देखा जो आज आइना, तो सोचना पड़ा,
जो दिख रहा है सामने, वो क्यूँ उदास है।  ........ संजीव मिश्रा

रविवार, 5 मई 2019

सारे दांव............

सारे दांव............

जेठ दुपहरी, नंगे पाँव,
सर न छतरी न कोई छाँव,
दूर-दूर तक निर्जन पथ है,
न कोई नगरी, न कोई गाँव ।


चलते जाना ही नियति है,
क्रूर समय की बहुत गति है,
सब पड़ाव पर अपने-अपने,
अपने हिस्से ठौर न ठाँव......


सभी प्रयास असफल ही निकले,
निठुर दैव के भाव न पिघले,
कर्म -भाग्य की बिछी थी चौसर,
उल्टे बैठे सारे दाँव......


जेठ दुपहरी, नंगे पाँव....... संजीव मिश्रा

शनिवार, 30 जुलाई 2016

आगामी गुरु गोचर....कन्या राशि में ........

अगस्त ग्यार तारीख़ से, गुरु कन्या का होय,
हित ज्योतिष-जिज्ञासु के, बरनूं फल मैं सोय,

प्रथम जानो संक्षेप में, किस पर शुभ यह चाल,
पीछे विस्तृत रूप में, पढ़ेंगे सारा हाल,

वृषभ, सिंह, मीन और मकर, वृश्चिक पर शुभ जान,
सर्वविधी अनुकूल, इस, समय को लीजो मान,

वृष से पंचम में चलें जब, गुरूदेव महाराज,
संकट सारे दूर हों, बन जाएँ सब काज,

सुख-उन्नति धन-आगमन, कार्य सफलता दायी,
पद-वृद्धि संतान-सुख, रहे ख़ुशी घर छायी,

सिंह से दूजे थान में, गुरूदेव जो जायँ,
धन-ख्याति दोनों बढ़ें, शत्रु दग्ध हो जायँ,

वृश्चिक से हो ग्यारहवें, जब गुरु का संचार,
कार्यालय पद-वृद्धि हो, उन्नति सभी प्रकार,

सुत की प्राप्ति हो तथा, मान बढे पद साथ,
शत्रु स्वयं ही नष्ट हों, लगे सफलता हाथ,

मकर राशि से नवम में, गुरु देव जब आयँ,
उत्तम भोजन, पुत्र-सुख, स्त्री-संग दे जायँ,

घर की होवे प्राप्ति, उन्नति सभी प्रकार,
मन में उपजे शान्ति, उत्तम रहें विचार,

कन्या के गुरु, मीन से, रहें सात घर दूर,
रहेगा उत्तम काल ये, सुख सम्पति भरपूर,

स्वास्थ्य सही रहवे तथा तन-मन नहीं विकार,
उत्सव में हो व्यस्तता, ऊंचों से सत्कार,

यात्राएं होवें सुखद,सर्व सफलतादाई ,
सुत-दारा का सुख रहे, बढ़ी रहे प्रभुताई,

वेध का भी, अंशों सहित, पूरा करें विचार,
शुभता में वृद्धि-कमी, रहे उसी अनुसार,

कर शास्त्रों से संकलित, तुक में दिया पिरोय,
त्रुटियों पर होवे क्षमा, श्रेय ऋषी को होय,

तुच्छ-अकिंचन-अल्पबुध, का यह क्षुद्र प्रयास,
                         नाम लघु “संजीव” है, गंगा तीरे वास     ........... संजीव मिश्रा

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

जीवन कुछ ऐसे है बीता......



जीवन कुछ ऐसे है बीता......

आँख के प्याले छल-छल छलके,
हृदय का घट था रीता-रीता,
जीवन कुछ ऐसे है बीता......

रुत उमंग की कभी न आयी,
नहीं ख़ुशी की  कोयल बोली,
चित अवसाद का, जनवासा था,
विदा हुई, आशा की डोली,

जैसे नगर में, सोने के इक,
हो रोयी, फिर कोई सीता... 

जीवन कुछ ऐसे है बीता......

जीवन ज्यों होली का अवसर ,
पर मैं रंग से रहा अछूता ,
जहाँ भी देखा, रंग ही रंग थे,
कैसा अनुपम दृश्य अनूठा,

सब थे शिर-पद रंग में डूबे,
मेरे कुरते, कोई न छींटा... 

जीवन कुछ ऐसे है बीता......

जैसे दीवाली पे जगमग,
महल-अटारी, कुटिया सारी,
पर इक शोकाकुल घर में हो,
गयी न बत्ती, मोम भी जारी,

सुख की भरी सभा में जैसे,
दुख हो दुर्योधन बन जीता...... 

जीवन कुछ ऐसे है बीता......

दुनिया थी संपति का मेला,
सुख-वैभव की चहुँ दिस झांकी,
सबकी इच्छाएं  वरदानित,
सबको था हासिल, इक साकी,

पर “संजीव” को प्राप्य, न था कुछ,
सिवा सांस के कोई सुभीता...... 

जीवन कुछ ऐसे है बीता......
 
आँख के प्याले छल-छल छलके,
हृदय का घट था रीता-रीता,

जीवन कुछ ऐसे है बीता......          ....संजीव मिश्रा