Monday, January 9, 2017

धिक्कार तुम्हारे धीरज पर.......

जेहादी आतंकी मुल्ला,
है  शीश मूंडने को कहता,
उनका मुखमंडल काला कर
फ़तवा देकर मोदी जी पर,

जीवित अब भी इस धरती पर?
धिक्कार तुम्हारे धीरज पर।

जिसकी आभा से देश केंचुए,
से परिवर्तित हो सर्प हुआ,
जिससे दुनिया में प्राप्त देश को,
फिर से खोया दर्प हुआ,

जिसके आने पर सेना ने,
दुश्मन को घुस कर मारा है,
उसके ही कोटि-शत भक्तों को,
इस मुल्ला ने ललकारा है,

और कब? जब वो इस बृहत् देश में,
मात्र एक हैं मुट्ठी भर??

फिर भी जीवित इस धरती पर?
धिक्कार तुम्हारे धीरज पर।

इस बार भी मौन रहे यदि तुम,
तो मान लो सब बेमानी है,
स्वीकार करो धमनी में बहता
रक्त नहीं बस पानी है,

कमलेश-साध्वी और पुरोहित
को थोड़ा तुम याद करो,
वो ओवैसी क्या कहता है
सोचो, निर्णय फिर बाद करो,

अपशब्द उछाले थे उसने
श्री राम औ उनकी जननी पर।

फिर भी जीवित इस धरती पर?
धिक्कार तुम्हारे धीरज पर।

कितना थुकवाओगे मुंह पर
कितना अपमान कराओगे,
सोचो किस मुंह से वीरों के
ख़ुद को वंशज कहलाओगे,

वो डैनमार्क के चित्रों पर
सड़कें रंजित कर देते हैं,
बंगाल में मां की गली-गली
प्रतिमा खंडित कर देते हैं,

तुम अब भी चुप, हैं हाथ वहाँ
उठते बहनों की चुनरी पर,

फिर भी जीवित इस धरती पर?
धिक्कार तुम्हारे धीरज पर।

मोदी केवल इक व्याक्ति नहीं,
इस राष्ट्र की इक अभिव्यक्ति है,
तन कर चलने का साहस है,
गर्वित रहने की शक्ति है,

इस पर उछली हर इक गाली
गोली में बदल वापस भेजो,
अगली पीढ़ी को हिन्दू बना
रहने का कुछ साहस दे दो।

कम से कम लाज रखो उसकी
हम हैं सवार जिस कशती पर।

जीवित अब भी इस धरती पर?
धिक्कार तुम्हारे धीरज पर।............... संजीव मिश्रा




Thursday, December 22, 2016

तैमूर.......

ख़ान संग काला करे, मुंह जब कोई कपूर,
तब दुनिया में आये है, एक नया तैमूर।
जेहादी इक सोच का, यह भी है परिणाम,
बर्बर आक्रांताओं का, बच्चों को दें नाम।
भले ही कितना दीजिये, इनको धन - सम्मान,
सदा देश वीरोध में, हर अनुयायी इस्लाम ।
लुटटेरे बन आये थे, अब भी रहे हैं लूट,
मूर्ख हिंदुओं, दूर करो अब ये परस्पर फूट।
हिन्दुस्तां बन जाएगा, इक दारुल-इस्लाम,
अग़र एक हम न हुए, ले मोदी का नाम,
विनती है "संजीव" की, सब मिल करें विचार,
अब इस्लामी सोच का, पूर्ण हो बाहिष्कार।............ संजीव मिश्रा 

Saturday, July 30, 2016

आगामी गुरु गोचर....कन्या राशि में ........

अगस्त ग्यार तारीख़ से, गुरु कन्या का होय,
हित ज्योतिष-जिज्ञासु के, बरनूं फल मैं सोय,

प्रथम जानो संक्षेप में, किस पर शुभ यह चाल,
पीछे विस्तृत रूप में, पढ़ेंगे सारा हाल,

वृषभ, सिंह, मीन और मकर, वृश्चिक पर शुभ जान,
सर्वविधी अनुकूल, इस, समय को लीजो मान,

वृष से पंचम में चलें जब, गुरूदेव महाराज,
संकट सारे दूर हों, बन जाएँ सब काज,

सुख-उन्नति धन-आगमन, कार्य सफलता दायी,
पद-वृद्धि संतान-सुख, रहे ख़ुशी घर छायी,

सिंह से दूजे थान में, गुरूदेव जो जायँ,
धन-ख्याति दोनों बढ़ें, शत्रु दग्ध हो जायँ,

वृश्चिक से हो ग्यारहवें, जब गुरु का संचार,
कार्यालय पद-वृद्धि हो, उन्नति सभी प्रकार,

सुत की प्राप्ति हो तथा, मान बढे पद साथ,
शत्रु स्वयं ही नष्ट हों, लगे सफलता हाथ,

मकर राशि से नवम में, गुरु देव जब आयँ,
उत्तम भोजन, पुत्र-सुख, स्त्री-संग दे जायँ,

घर की होवे प्राप्ति, उन्नति सभी प्रकार,
मन में उपजे शान्ति, उत्तम रहें विचार,

कन्या के गुरु, मीन से, रहें सात घर दूर,
रहेगा उत्तम काल ये, सुख सम्पति भरपूर,

स्वास्थ्य सही रहवे तथा तन-मन नहीं विकार,
उत्सव में हो व्यस्तता, ऊंचों से सत्कार,

यात्राएं होवें सुखद,सर्व सफलतादाई ,
सुत-दारा का सुख रहे, बढ़ी रहे प्रभुताई,

वेध का भी, अंशों सहित, पूरा करें विचार,
शुभता में वृद्धि-कमी, रहे उसी अनुसार,

कर शास्त्रों से संकलित, तुक में दिया पिरोय,
त्रुटियों पर होवे क्षमा, श्रेय ऋषी को होय,

तुच्छ-अकिंचन-अल्पबुध, का यह क्षुद्र प्रयास,
                         नाम लघु “संजीव” है, गंगा तीरे वास     ........... संजीव मिश्रा

Friday, February 27, 2015

जीवन कुछ ऐसे है बीता......



जीवन कुछ ऐसे है बीता......

आँख के प्याले छल-छल छलके,
हृदय का घट था रीता-रीता,
जीवन कुछ ऐसे है बीता......

रुत उमंग की कभी न आयी,
नहीं ख़ुशी की  कोयल बोली,
चित अवसाद का, जनवासा था,
विदा हुई, आशा की डोली,

जैसे नगर में, सोने के इक,
हो रोयी, फिर कोई सीता... 

जीवन कुछ ऐसे है बीता......

जीवन ज्यों होली का अवसर ,
पर मैं रंग से रहा अछूता ,
जहाँ भी देखा, रंग ही रंग थे,
कैसा अनुपम दृश्य अनूठा,

सब थे शिर-पद रंग में डूबे,
मेरे कुरते, कोई न छींटा... 

जीवन कुछ ऐसे है बीता......

जैसे दीवाली पे जगमग,
महल-अटारी, कुटिया सारी,
पर इक शोकाकुल घर में हो,
गयी न बत्ती, मोम भी जारी,

सुख की भरी सभा में जैसे,
दुख हो दुर्योधन बन जीता...... 

जीवन कुछ ऐसे है बीता......

दुनिया थी संपति का मेला,
सुख-वैभव की चहुँ दिस झांकी,
सबकी इच्छाएं  वरदानित,
सबको था हासिल, इक साकी,

पर “संजीव” को प्राप्य, न था कुछ,
सिवा सांस के कोई सुभीता...... 

जीवन कुछ ऐसे है बीता......
 
आँख के प्याले छल-छल छलके,
हृदय का घट था रीता-रीता,

जीवन कुछ ऐसे है बीता......          ....संजीव मिश्रा