शनिवार, 24 जनवरी 2015

सुना है के बाहर बसंत आ गया है.......



सुना है के बाहर बसंत आ गया है.......

सुना है के बाहर बसंत आ गया है,
तो फ़िर  ये कुहासा क्यूं छंटता नहीं है,
ये उलझन का बादल क्यों हटता नहीं है,
समस्याओं की धुंध मिटती नहीं क्यूं,
क्यूं मन पर उदासी का रंग आ गया है.....
सुना है के बाहर बसंत आ गया है..........

सुना है के बाहर बसंत आ गया है,
अभावों की, पर, बर्फ़ अब भी जमी है,
समाधान की धूप अब भी नहीं है,
हताशा का था राज इकछत्र, अब-
एक स्थायी नैराश्य संग आ गया है...
सुना है के बाहर बसंत आ गया है........

सुना है के बाहर बसंत आ गया है,
मग़र रुत कठिन क्यों है जीवन में अब तक,
कटेगी उमर ये भला यूं ही कब तक,
कि कब तक यूं शापित-से जीते रहेंगे,
के “संजीव” भी अब तो तंग आ गया है......
सुना है के बाहर बसंत आ गया है.....

सुना है के बाहर बसंत आ गया है.......

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