सोमवार, 20 जनवरी 2014

जंग बुरे की अच्छे से...........

शठे-शाठ्यम समाचरेत की नीति तो यह कहती है,
मैं भी पत्थर ले आऊँ ग़र, मुझ पर  ईंट उछलती है,

महावीर-बुध और गांधी का, दर्शन कहाँ प्रासंगिक है,
शठ-धूर्त-मूढ़ के शब्दों में, इक अतिशय घृणा झलकती है,

हूँ सबल-समर्थ मैं हर भांति, देने को उसको हर उत्तर,
पर विनय है लक्षण विद्या का, बस ये ही बात उलझती है,

मैं बात करूँ मानवता की, वो वर्गभेद पर अटका है,
मेरी देशभक्ति पर लिखी कोई पंक्ति भी उसे अखरती है,

वो जो है, जैसा भी है, मुझको कोई हर्ष-विषाद नहीं,
पर मैं जो हूँ, वो क्यों हूँ, उसको बात ये पीड़ित करती है,

“संजीव” को मैं दिन रात यही, बस बात एक समझाता हूँ,
यह जंग बुरे की अच्छे से, हर युग में चलती रहती है........ संजीव मिश्रा

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