Tuesday, October 22, 2013

तेरे नाम करता हूँ

तुम्हारी भावनाओं की मैं कुछ यूं क़द्र करता हूँ,
तुम्हारे साथ करवा चौथ का व्रत मैं भी रखता हूँ,

नहीं तुम ये समझ लेना सिरफ तुमको मुहब्बत है,
दिखा मैं दिल नहीं सकता के कितना प्यार करता हूँ,

ज़रुरत क्या मुझे किस चीज़ की, जब सामने तुम हो,
तुम्हीं पर बस शुरू, तुम पर ख़तम, सब काम करता हूँ,

पिलाऊँ शाम को जब पानी मैं, मुझको पिलाना तुम,
समापन इस तरह इस व्रत का मैं इस शाम करता हूँ,

मैं तेरा हूँ,  इसी बस बात पर है फ़ख्र इक मुझको,
तू मेरी है मैं इस  सौभाग्य का सम्मान करता हूँ,

तू मेरे साथ खुश  रहती है मेरी तंगहाली  में,
शिकायत तू कभी कुछ कर, बड़ा अरमान  करता हूँ,

हूँ मुफ़लिस, पैसे कुछ कम हैं, मगर दिल का मैं राजा हूँ,
मैं रानी साहिबा को सर झुका परणाम करता हूँ,

तेरे “संजीव” का तुझको यही तोहफ़ा है छोटा सा,
मेरी अर्धांगिनी ख़ुद को मैं तेरे नाम करता हूँ....... संजीव मिश्रा

dedicated to my Dear Wife... :)

2 comments:

दिगम्बर नासवा said...

प्रेम को समर्पण के मुकाम तक ले जाती रचना ... जहां बस प्रेम ही प्रेम हो ... अच्छे शेर हैं सभी ...

Sanjeev Mishra said...

इकलौते एवं एकमात्र पाठक एवं प्रशंसक को अनेकों धन्यवाद एवं हार्दिक आभार.....

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