Saturday, January 3, 2009

ऐसे नसीब कब हैं ........

हालात जो पहले थे ,
हालात वही अब हैं ,
कुछ चैन की साँसें लें ,
ऐसे नसीब कब हैं ।


इक हम ही हैं अकेले ,
गमज़दां , परेशां ,
बाक़ी तो इस जहाँ में ,
शादो-आबाद सब हैं ।


हम ढूंढ नहीं पाये ,
खुश होने का बहाना ,
रहने को उदास लेकिन ,
अनगिन यहाँ सबब हैं ।


होठों पे जिनके गाली ,
हाथों में जिनके खंज़र ,
ऐसे ही लोग कुछ अब ,
बन बैठे मेरे रब हैं ।


इस दुनिया में नहीं है ,
कहीं भी मेरा गुज़ारा ,
कुछ हम भी हैं अनोखे ,
कुछ लोग भी अजब हैं ।



5 comments:

महेंद्र मिश्रा said...

bahut khoobasoorat rachana . mishra ji likhate rahiye . dhanyawad.

G M Rajesh said...

gujaaraa fir bhi chaltaa hai
pahle bhi thaa
aaj hai
kal rahegaa

shelley said...

kuch hum v anokhe kuch log v ajab hai..........
bahut khub. ek dam sahi.

purnima said...

bhut sunder rachna he.
sanjeev ji

satish sharma 'yashomad' said...

bahoot sunder..

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