Saturday, December 13, 2008

कुछ रेत जैसी खुशियाँ ..........

दोज़ख़ हो देखनी ग़र ,
तो मुझको देख ले तू ,
इक ज़िन्दा मिसाल हूँ मैं ,
तेरे सामने ज़माने ।

कुछ रेत जैसी खुशियाँ
हैं बस तेरी मुट्ठी में ,
मैंने दिल में छुपा रखे हैं ,
ग़म के कई ख़जाने ।

क्यूँ वक़्त ज़ाया करता
है दुनिया के तरानों में ,
फ़ुर्सत से आ किसी दिन ,
और सुन मेरे फ़साने ।

मैं याद करता आया ,
ता - उम्र जिस ख़ुदा को ,
वो ख़ुदा कहाँ छुपा है
ये तो ख़ुदा ही जाने ।


सुनता है वो सभी की ,
कुछ देर भले हो जाए ,
दुनिया ये मानती हो ,
“संजीव ” तो न माने ।

1 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया लिखा है।
पढ कर आनंद आ गया।धन्यवाद।

Post a Comment